मानव जीवन में व्यायाम की उपयोगिता अथवा व्यायाम का महत्व। व्यायाम निबंध। व्यायाम निबंध हिंदी में । SA on exercise in hindi ।

मानव जीवन में तभी सुखी रहता है जब उसका शरीर स्वस्थ हो। स्वस्थ शरीर मानव के लिए बहुत ही आवश्यक है स्वस्थ शरीर के लिए नियमित रूप से व्यायाम करना बहुत आवश्यक है। व्यायाम करने से शारीरिक सुखों के साथ-साथ मनुष्य को मानसिक संतुष्टि भी प्राप्त होती है क्योंकि इससे उसका मन भी सदा स्फूर्तिमय, उत्साहपूर्ण तथा आनंदमय बना रहता है ।इसी कारण "Health is Wealth" कहा गया है।
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महर्षि चरक ने लिखा है कि धर्म, अर्थ, काम, और  मोक्ष इन चारों का मूल आधार स्वास्थ्य ही है। यह बात अपने आप में नितांत सत्य है। मानव जीवन की सफलता धर्म ,अर्थ ,काम और मोक्ष प्राप्त करने में ही निहित है, परंतु आधारशिला मनुष्य का स्वास्थ्य है। उसका निरोग जीवन है रुग्ण और स्वस्थ मनुष्य ना धर्म चिंतन कर सकता है। ना अर्थ उपार्जन कर सकता है, ना काम प्राप्ति कर सकता है, और ना मानव जीवन के सबसे बड़े स्वार्थ मोक्ष की ही उपलब्धि कर सकता है क्योंकि इन सब का मूल आधार शरीर है, इसलिए कहा गया है कि
शरीर माद्यम् खलु  धर्म साधनम्
स्वस्थ व्यक्ति न अपना कल्याण कर सकता है न अपने परिवार का न अपने समाज की उन्नति कर सकता है और न देश की ।
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जिस देश के व्यक्ति अस्वस्थ और अशक्त होते हैं वह देश न आर्थिक उन्नति कर सकता है और ना सामाजिक। देश का निर्माण ,देश की उन्नति, बाहर और आंतरिक शत्रुओं से रक्षा, देश का समृद्धि शाली होना वहां के नागरिकों पर आधारित करता है। सभ्य और अच्छा नागरिक वही हो सकता है जो तन, मन ,धन से देशभक्त हो और मानसिक और आत्मिक स्थिति में उन्नत हो। इन दोनों ही कर्मों में शरीर का स्थान प्रथम है। बिना शारीरिक उन्नति के मनुष्य ना देश की रक्षा कर सकता है और ना अपनी मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है।
व्यायाम शब्द का अर्थ शारीरिक श्रम से ही लगाया जाता है। बौद्धिक क्षेत्र मैं भी इसका प्रयोग सुना जाता है जब किसी दुरूह कल्पना की बात कोई व्यक्ति करता है ।तो लोग कहते हैं कि यह तो बौद्धिक व्यायाम मात्र है। सोचने की समुचित प्रणाली को बौद्धिक व्यायाम की संख्या दी जाती है। प्राय: यह देखा जाता है की बौद्धिक काम करने वाले लोगों का स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता, अतः उनके लिए व्यायाम की आवश्यकता अधिक रहती है, महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है। कि वह पहले व्यायाम को व्यर्थ समझते थे, किंतु बाद में उन्होंने इसके महत्व को समझा और बाकी जीवन में नित्य प्रात :काल व्यायाम के रूप में भ्रमण करते थे। कहा भी गया है कि आलस्य ही मनुष्य शरीरस्थो शुद्ध महान रिपु:।
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आज है मनुष्य के शरीर में विद्यमान एक महान शत्रु है। आलस्य मनुष्य के जीवन को शिथिल बना देता है, उसकी बुद्धि कमजोर हो जाती है। शरीर और बुद्धि का संबंध अंतरंग नसों और अंग प्रत्यंगों से होता है। व्यायाम से शरीर के आंतरिक अंगों में फुर्ती आती है और रक्त संचार में गति आती रहती है, जिससे मन प्रश्न रहता है और शरीर स्वस्थ होता है। व्यायाम के बिना पाचन क्रिया ठीक ढंग से नहीं होती। जिससे पेट को अनेक प्रकार के रोगों का सामना करना पड़ता है। व्यायाम से रोगों की उत्पत्ति नहीं हो पाती। इसका कारण यह है कि व्यायाम करने से रक्त में रहने वाले कीटाणु सफल हो जाते हैं और वे रोग उत्पन्न करने वाले कीटाणुओं को नष्ट कर देते हैं। प्राचीन काल से यह बात सुनी जाती है कि " तंदुरुस्ती ही हजार नियमत है" इसका मतलब यह है कि तंदुरुस्ती कुदरत की हजार नियमों की तरह है। इसलिए पहला सुख निरोग काया ही माना गया है। शरीर को निरोग रखने के लिए व्यायाम आवश्यक है। इससे शरीर सुडोल तथा अंग संस्थान व्यवस्थित होता है। स्वभाव की गंभीरता और प्रसन्नता के लिए भी व्यायाम आवश्यक है। जो लोग रोगी, अस्वस्थ और कमजोर होते हैं। वह चिड़चिड़ो स्वभाव के होते हैं और कभी सुखी नहीं रह पाते। उनमें किसी प्रकार का तेज और आभार नहीं रहती। वे जीवन में कभी भी उन्नति नहीं कर पाते। यह भी प्रसिद्ध है।' स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मास्तिष्क रहा करता है।(Sound body has a sound mind) यही कारण है 
की अस्वस्थ मनुष्य ज्ञान में पिछड़े पाए जाते हैं। स्वस्थ का अर्थ केवल मोटा नहीं होता। अनेक मोटे व्यक्ति अत्यंत निर्बल और अकल में मोटे होते हैं। स्वास्थ्य से मनुष्य की बुद्धि ठीक रहती है तथा अस्वस्थ मनुष्य की बुद्धि मंद हो जाती है। अतः स्वस्थ रहने के लिए व्यायाम आवश्यक है। इसी प्रकार मानसिक उन्नति के लिए मानसिक व्यायाम आवश्यक है। पढ़ना, लिखना, चिंतन -मनन  आदि मानसिक व्यायाम है। इनके द्वारा मन और बुद्धि का समुचित विकास होता है। मन में प्रफुल्लता और स्फूर्ति आती है। अतः मनका अवसाद और आज से हटाने के लिए व्यायाम आवश्यक है। भ्रमण करना ,शुद्ध हवा का सेवन करना आदि भी एक प्रकार के व्यायाम है। अतः साधारण इयत्ता शरीर के स्वस्थ था और मन की प्रसन्नता व्यायाम के लिए आवश्यक है ।
स्वास्थ्य और व्यायाम को सभी लोग लाभ कर मानते हैं, पर इसके साथ ही साथ यदि ब्रह्मचर्य का पालन नहीं हो किया जाता तो व्यायाम भी हितकर नहीं हो। ब्रह्मचर्य रक्षा से ही आयु, यज्ञ ,विद्या ,बुद्धि आदि बढ़ते हैं। इसके बिना सभी प्रकार के व्यायाम व्यर्थ हो जाते हैं। यही कारण है कि जो व्यक्ति ब्रह्मचर्य का नियमित पालन करते हैं उनका स्वास्थ्य ठीक रहता है, उनकी बुद्धि प्रखर होती है तथा उनके मुंह पर एक प्रकार का तेज व्याप्त रहता है। अतः व्यायाम के साथ ही संयम- नियम की आवश्यकता कम नहीं है।
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जो लोग सामान्यता स्वास्थ्य- रक्षा के लिए व्यायाम करते हैं आजीवन स्वस्थ रहते हैं और वृद्धावस्था में भी उन में कमजोरी नहीं आती और किसी प्रकार के रोग उन्हें नहीं सताते हां जो लोग पहलवानी के लिए युवावस्था मैं बहुत अधिक व्यायाम करते हैं, उन्हें वृद्धा व्यवस्था में बहुत कष्ट होता है और उनकी दें पूर्वी हवा में दर्द करती है। अतः व्यायाम  भी सीमा के भीतर ही उपयोगी होता है। सभी वस्तुओं की सीमा अनिवार्य होती है। नियमित और संयमित रूप से व्यायाम करना ही श्रेयस्कर है अन्यथा शरीर को अत्यंत कष्ट होता है।
व्यायाम करने से पहले कुछ जरूरी बातें
व्यायाम का उचित समय प्रातः काल और सायं  काल है। प्रात: शौच इत्यादि से निवृत्त होकर, बिना कुछ खाए पिए शरीर पर थोड़ी देर तेल की मालिश करके व्यायाम करना चाहिए। व्यायाम करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि शरीर के सभी अंग- प्रत्यंगों का व्यायाम हो, शरीर के कुछ ही अंगों पर जोर पड़ने से वे पुष्ट हो जाते हैं। परंतु अन्य अंग कमजोर ही बने रहते हैं। इस तरह शरीर बेडौल हो जाता है। व्यायाम करते समय जब श्वास फूलने लगे तो व्यायाम करना बंद कर देना चाहिए, अन्यथा शरीर की नसे टेढ़ी हो जाती हैं और शरीर बुरा लगने लगता है, जैसा कि अधिकांश पहलवानों को देखा जाता है, किसी की टांगे टेडी तो किसी के कान। व्यायाम करते समय मुंह से श्वास कभी नहीं लेना चाहिए, व्यायाम करते समय सांस हमेशा नाक से लेना चाहिए। व्यायाम करने के लिए सबसे उचित स्थान उसे माना जाता है जहां शुद्ध वायु और प्रकाश हो और वह स्थान चारों ओर से खुला हुआ हो क्योंकि फेफड़ों में शुद्ध वायु आने से उनमें शक्ति आती है। एक नवीन स्फूर्ति आती है और उनकी अशुद्ध वायु बाहर निकलती है। व्यायाम की तुरंत पश्चात फिर थोड़ा तेल मालिश करनी चाहिए जिससे शरीर की थकान दूर हो जाए।
फिर प्रसन्नता पूर्वक शुद्ध वायु में कुछ समय तक विश्राम और विचरण करना चाहिए। जब शरीर का पसीना सूख जाए और शरीर की थकान दूर हो जाए तब स्नान करना चाहिए। इसके पश्चात दूध आदि पौष्टिक पदार्थों का सेवन परम आवश्यक है। बिना पौष्टिक पदार्थों के व्यायाम से भी अधिक लाभ नहीं होता। व्यायाम का अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए।
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आज की वैज्ञानिक युग में प्राय: सभी कार्यों के लिए विभिन्न प्रकार के साधन और उपकरण बन गए हैं। व्यायाम के लिए साधनों और उपकरणों की कमी नहीं है। किंतु शरीर के बाह्य और अंतरिक्ष संतुलन को स्थिर  रखने के लिए अनेक प्रकार के आसन बनाए गए हैं। इन आसनों का अभ्यास करने से शरीर के विभिन्न अंगों को यथा योग्य श्रम करना पड़ता है तथा उसी क्रम से उनका विकास भी होता है। अतः इस प्रकार का व्यायाम अधिक कल्याणकारी है। व्यायाम के लिए खुली हवा और खुली जगह आवश्यक होती है ताकि श्वास लेने के लिए स्वच्छ वायु मिल सके।
अतः हमारा कर्तव्य है कि हम अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहें तथा जीवन के व्यस्त क्षणों में से कुछ समय निकालकर व्यायाम अवश्य करें। इससे हमारा मन और तन पूर्ण रूप से स्वस्थ रहेगा।

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